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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
भूरिश्रवा हतो यत्र सोमदत्तश्च संय़ुगे |  ३२   क
वाह्लीकश्च महाराज किमन्यद्भागधेय़तः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति