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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
शकुनिः सौवलो यत्र कैतव्यश्च महावलः |  ३७   क
निहतः सवलो वीरः किमन्यद्भागधेय़तः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति