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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
भागधेय़समाय़ुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नरः |  ४१   क
यश्च भाग्यसमाय़ुक्तः स शुभं प्राप्नुय़ान्नरः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति