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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
नान्यदत्र परं मन्ये वनवासादृते प्रभो |  ४३   क
सोऽहं वनं गमिष्यामि निर्वन्धुर्ज्ञातिसङ्क्षय़े ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति