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सभा पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ाणां केन ते राजन्योद्धुं वितरते मनः |  २   क
अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति