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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनो हतो यत्र शल्यश्च निहतो युधि |  ४५   क
दुःशासनो विशस्तश्च विकर्णश्च महावलः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति