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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि भीमसेनस्य श्रोष्येऽहं शव्दमुत्तमम् |  ४६   क
एकेन समरे येन हतं पुत्रशतं मम ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति