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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
असकृद्वदतस्तस्य दुर्योधनवधेन च |  ४७   क
दुःखशोकाभिसन्तप्तो न श्रोष्ये परुषा गिरः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति