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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
केचिन्न सम्यक्पश्यन्ति मूढाः सम्यक्तथापरे |  ५६   क
तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वचः स्म ह ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति