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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
यदव्रवीन्मे धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान् |  ५७   क
तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति