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वन पर्व
अध्याय २८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तदेव सर्वं सावित्र्या महाभाग्यं महर्षय़ः |  २   क
द्युमत्सेनाय़ नातृप्यन्कथय़न्तः पुनः पुनः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति