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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
को वा मुखमनीकानामासीत्कर्णे निपातिते |  ५९   क
अर्जुनं वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति