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वन पर्व
अध्याय ७२
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दमय़न्त्यु उवाच
अत्र मे महती शङ्का भवेदेष नलो नृपः |  ३   क
तथा च मे मनस्तुष्टिर्हृदय़स्य च निर्वृतिः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति