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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्धत्वाद्यदि तेषां तु न मे रूपनिदर्शनम् |  ६   क
पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति