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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं मद्रराजस्य संय़ुगे |  ६०   क
वामं च योद्धुकामस्य के वा वीरस्य पृष्ठतः ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति