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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालाश्च यथा सर्वे निहताः सपदानुगाः |  ६३   क
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति