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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाश्च यथा मुक्तास्तथोभौ सात्वतौ युधि |  ६४   क
कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मजः ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति