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शान्ति पर्व
अध्याय २९९
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याज्ञवल्क्य उवाच
मनस्युपरते राजन्निन्द्रिय़ोपरमो भवेत् |  १७   क
न चेन्द्रिय़व्युपरमे मनस्युपरमो भवेत् |  १७   ख
एवं मनःप्रधानानि इन्द्रिय़ाणि विभावय़ेत् ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति