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स्त्री पर्व
अध्याय २०
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गान्धार्यु उवाच
दुर्मरं पुनरप्राप्ते काले भवति केनचित् |  २२   क
यदहं त्वां रणे दृष्ट्वा हतं जीवामि दुर्भगा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति