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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च सर्वशः |  ५४   क
अष्टम्यां सर्वपक्षाणां व्रह्मचारी सदा भवेत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति