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शान्ति पर्व
अध्याय २०
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वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञैरिन्द्रो विविधैरन्नवद्भि; र्देवान्सर्वानभ्ययान्महौजाः |  ११   क
तेनेन्द्रत्वं प्राप्य विभ्राजतेऽसौ; तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपय़ोज्यम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति