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अनुशासन पर्व
अध्याय २०
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भीष्म उवाच
प्रीतोऽस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप |  २७   क
तव प्रसादाद्भगवन्महर्षेश्च महात्मनः |  २७   ख
निय़ोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान्भव ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति