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अनुशासन पर्व
अध्याय २०
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भीष्म उवाच
ऋषिः समन्ततोऽपश्यत्तत्र तत्र मनोरमम् |  ३८   क
ततोऽभवत्तस्य चिन्ता क्व मे वासो भवेदिति ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति