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अनुशासन पर्व
अध्याय २०
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अष्टावक्र उवाच
अथ तां संविशन्प्राह शय़ने भास्वरे तदा |  ४८   क
त्वय़ापि सुप्यतां भद्रे रजनी ह्यतिवर्तते ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति