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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
सर्वः स्वे स्वे गृहे राजा सर्वः स्वे स्वे गृहे गृही |  १४७   क
निग्रहानुग्रहौ कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ||  १४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति