अनुशासन पर्व  अध्याय २०

अष्टावक्र उवाच

व्रह्मन्न कामकारोऽस्ति स्त्रीणां पुरुषतो धृतिः |  ५३   क
कामेन मोहिता चाहं त्वां भजन्तीं भजस्व माम् ||  ५३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति