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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
छित्त्वा ध्वजं शतेनैव शतधा पुरुषर्षभः |  ६२   क
चकार विरथं कर्णं तव पुत्रस्य पश्यतः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति