आश्रमवासिक पर्व  अध्याय २०

वैशम्पाय़न उवाच

ततोऽभिरूपान्भीष्माय़ व्राह्मणानृषिसत्तमान् |  २   क
पुत्रार्थे सुहृदां चैव स समीक्ष्य सहस्रशः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति