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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं सङ्कीर्त्य भीष्मं च सोमदत्तं च वाह्लिकम् |  ५   क
दुर्योधनं च राजानं पुत्रांश्चैव पृथक्पृथक् |  ५   ख
जय़द्रथपुरोगांश्च सुहृदश्चैव सर्वशः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति