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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
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वैशम्पाय़न उवाच
स श्राद्धय़ज्ञो ववृधे वहुगोधनदक्षिणः |  ६   क
अनेकधनरत्नौघो युधिष्ठिरमते तदा ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति