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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
तच्छ्रुत्वा विमनास्तत्र आचार्यो महदप्रिय़म् |  ११७   क
निय़म्य दिव्यान्यस्त्राणि नाय़ुध्यत यथा पुरा ||  ११७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति