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सभा पर्व
अध्याय २०
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वासुदेव उवाच
स्वर्गं ह्येव समास्थाय़ रणय़ज्ञेषु दीक्षिताः |  १५   क
यजन्ते क्षत्रिय़ा लोकांस्तद्विद्धि मगधाधिप ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति