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सभा पर्व
अध्याय २०
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जरासन्ध उवाच
अतोऽन्यथाचरँल्लोके धर्मज्ञः सन्महाव्रतः |  ४   क
वृजिनां गतिमाप्नोति श्रेय़सोऽप्युपहन्ति च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति