वन पर्व  अध्याय २०

वासुदेव उवाच

न मे भय़ं रौक्मिणेय़ सङ्ग्रामे यच्छतो हय़ान् |  २   क
युद्धज्ञश्चास्मि वृष्णीनां नात्र किञ्चिदतोऽन्यथा ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति