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वन पर्व
अध्याय २०
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वासुदेव उवाच
तमर्चितं सर्वदाशार्हपूगै; राशीर्भिरर्कज्वलनप्रकाशम् |  २०   क
दृष्ट्वा शरं ज्यामभिनीय़मानं; वभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति