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आदि पर्व
अध्याय १०७
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वैशम्पाय़न उवाच
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् |  ३२   क
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति