वन पर्व  अध्याय २०

वासुदेव उवाच

स द्वारकां परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिरर्दितः |  २७   क
सौभमास्थाय़ राजेन्द्र दिवमाचक्रमे तदा ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति