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विराट पर्व
अध्याय १०
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विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरं वृहन्नडे; सुतां च मे नर्तय़ याश्च तादृशीः |  १०   क
इदं तु ते कर्म समं न मे मतं; समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति