वन पर्व  अध्याय २०

वासुदेव उवाच

प्रतोदेनाहता राजन्रश्मिभिश्च समुद्यताः |  ९   क
उत्पतन्त इवाकाशं विवभुस्ते हय़ोत्तमाः ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति