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विराट पर्व
अध्याय २०
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द्रौपद्यु उवाच
तस्या विदित्वा तं भावं स्वय़ं चानृतदर्शनः |  १७   क
कीचकोऽय़ं सुदुष्टात्मा सदा प्रार्थय़ते हि माम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति