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द्रोण पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
तमेवमुक्त्वा शिनिपुङ्गवस्तदा; महामृधे सोऽग्र्यधनुर्धरोऽरिहा |  ३   क
किरन्समन्तात्सहसा शरान्वली; समापतच्छ्येन इवामिषं यथा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति