विराट पर्व  अध्याय २०

द्रौपद्यु उवाच

पापात्मा पापभावश्च कामरागवशानुगः |  २५   क
अविनीतश्च दुष्टात्मा प्रत्याख्यातः पुनः पुनः |  २५   ख
दर्शने दर्शने हन्यात्तथा जह्यां च जीवितम् ||  २५   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति