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विराट पर्व
अध्याय २०
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द्रौपद्यु उवाच
वदतां वर्णधर्मांश्च व्राह्मणानां हि मे श्रुतम् |  २८   क
क्षत्रिय़स्य सदा धर्मो नान्यः शत्रुनिवर्हणात् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति