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विराट पर्व
अध्याय २०
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भीमसेन उवाच
दुःशासनस्य पापस्य यन्मय़ा न हृतं शिरः |  ४   क
तन्मे दहति कल्याणि हृदि शल्यमिवार्पितम् |  ४   ख
मा धर्मं जहि सुश्रोणि क्रोधं जहि महामते ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति