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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
महार्हरूपं द्विषतां भय़ङ्करं; विभाति चात्यर्थसुखं सुगन्धि तत् |  १४   क
निजघ्नुषे देवरिपून्सुरेश्वरः; स्वय़ं ददौ यत्सुमनाः किरीटिने ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति