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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
स तन्न ममृषे द्रोणः पाञ्चाल्येनार्दनं मृधे |  १३   क
ततस्तस्य विनाशाय़ सत्वरं व्यसृजच्छरान् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति