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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
सौमदत्तिं रणे शूरमार्श्यशृङ्गिं च राक्षसम् |  ५७   क
त्रिगर्तराजं च रणे सह सर्वैर्महारथैः |  ५७   ख
अहमावारय़िष्यामि वेलेव मकरालय़म् ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति