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मौसल पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रं यास्यति श्रीमांस्त्यक्त्वा देहं हलाय़ुधः |  १०   क
जरा कृष्णं महात्मानं शय़ानं भुवि भेत्स्यति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति