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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
तं दहन्तमनीकानि क्रुद्धमग्निं यथा वनम् |  २४   क
दृष्ट्वा रुक्मरथं क्रुद्धं समकम्पन्त सृञ्जय़ाः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति