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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
सर्वा दिशः समचरत्सैन्यं विक्षोभय़न्निव |  २८   क
वली शूरो महेष्वासो मित्राणामभय़ङ्करः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति