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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु पाण्डवानीके चकार कदनं महत् |  ३०   क
यथा दैत्यगणे विष्णुः सुरासुरनमस्कृतः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति